Are we free or are we bound by the perceptions of the world influenced by Western culture? Have we forgotten the education, language and moral values of our ancestors? We have lost our roots. We have to return and revive ‘Vedic India’. This lecture deals with inter-caste relationships, changes in hierarchies of different castes over time, and analysis of the rights of varnas.
The basic meaning of the ‘varn’ implies the act of choosing, or what to choose. A person’s ‘varna’ can be determined on the basis of his or her abilities, desires, interests etc. The Varna system has its origin in the Vedas and applies to all members of society. But in modern times, this concept has taken very complex and controversial connotations. Actually no one uses the word ‘varna’ anymore. The word popularly used for a classification now is, ‘jaati’ or caste.
The basic meaning of jaati is to make a classification on the basis of one or several parameters. The examples can be – the human race, female race, animal race etc. But as the meaning of words changes over time, the meaning of the word jaati has also changed in modern society. Nowadays it implies a caste, such as Brahmin caste, Rajput caste etc.
About the Speaker:
Mohit Bhardwaj tries to redress the negative opinions about society varna and jaati. What was the purpose of this system? What is the role of the four ‘varnas’ in modern society? What are the usual perceptions about the various castes? The speaker addresses these questions and clarifies many of the misconceptions about jaati and varnas in modern society.
क्या हम स्वतंत्र हैं या पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित विश्व में जकड़ें हुए हैं ? क्या हमनें पूर्वजों की शिक्षा, भाषा और नैतिक मूल्यों को भुला दिया हैं? हम अपनी जड़ों से भटक गए हैं । हमें वापस लौटना हैं और ‘वैदिक भारत’ को पुनर्जीवित करना हैं। इस व्याख्यान में आपको अंतर्जातीय सम्बन्ध, समय के साथ विभिंन जातियों का पदानुक्रम में परिवर्तन और वर्णों के आधिकारों का विश्लेषण हैं ।
Video Transcript (AI Generated):
जब मैं काफी युबा था, आयू में और भी, डस्वी, ग्यार्वी के समय था, काफी इच्छा थी चीजों को जानने की, पहली बार एक प्रकार से कहें तो घर से बाहर निकला, होस्टल में जाके रहना शुरू किया, बहुत कुछ एक्स्ट्लोर करने की मन में था. तब बहुत सरे बेसिक क्वेशन्स, जो शायद हर किसी के दिमाग में आते हुँगे, और हर कोई अपने-अपने स्थर से उनके उत्तर ढूंढने का प्रयास करता है, आइडिन्टिटी को लेकर के, मैं कौन हूँ इस बात को लेकर के, बहुत ज़्यादा स्पिरिश्वल नहीं, लेकिन सोशियल थोड़ा ज़्यादा, उन सब को लेकर के एक खोजना थोड़ा शुरू किया, धिरी-धिरी लगा के मेरी पहचान संस्कृत से जुड़ी है, संस्कृत सीखी, उसके बाद में, बारवी के बाद में, अपना उपनाएन कराने के लिए मैं मत्तुरू गया, वो भी भाग्य की बात थी, संयोग की बात थी, कि मत्तुरू में मेरा कुछ संपर्ख निकल आया, और तब मुझे पहली बार ऐसा लगा, कि मतलब यह तो एकडम ही आइसोलेटेट दुनिया है, जैसा फिल्मों में दिखाते हैं, जैसा भी कुंफु पांड़ा 3 में था, पांड़ाओं का गाह एक अलग छपा हुआ है, बिल्कुल वैसी यह दुनिया है, आदुनिक दुनिया से एकडम अस्परिष्ट, और पुरानी चीजों को भी भी अपने में समेटे हुए, लेकिन 2004 में ही दुधेश्वरनाथ वेद विद्याले खुला, वहाँ पर मैंने यजरवेद का अध्यान किया, उसके बाद मैं आगे रिगवेद और शातपत ब्रह्मन का अध्यान करने के लिए पुरे गया, पुरे के पास मैं आलंदी देवाची नाम से एक जगा है, वहाँ कुछ अध्यान किया, थोड़ा बहुत और भागी भारत का ब्रह्मन किया, सोयम से अध्यान किया, कुछ विद्वानों से मिलना हुआ, 10-12 साल में, काफी कुछ सीखने को मिला, सीखने के बाद में, दो-तीन बातें जो मुझे विशेश खट की, उनमें पहली तो यही थी, जो मैं साइलोज वाली बात कहरा था, दो अलग-अलग एकडम दुनिया है, एक दुनिया जो पारंपरिक लोगों की है, जो अभी भी अपने आप में, कई हजार साल पहले के विचारों को, और सभ्यताओं को समेटे हुए है, और एक आध्वनिक दुनिया है, जो उसको बिल्कुल भी नहीं जानती है, किसी भी जाती, जाती से मेरा तात पर है, तो भारत को छोड़ कर के कितनी सभ्यताओं नष्ट हो गई, सभी की सभी नष्ट हो गई, और अब उनमें पुराने कोई चिन बिल्कुल भी नहीं बचे हैं, केवल पुस्तकों में देखने को मिलते हैं, लेकिन भारत में कुछ ऐसा विशेस था, कि लगातार विरोध होने के बाद भी, लगातार दलन होने के बाद भी, हम बचे रहे, और हमने अपने मूल तत्वों को कहीं न कहीं, चाहें वो मक्तूर जैसे छोटे गाउं में, या वेद पाठ शालाओं में, कहीं भी, उसके लगा आम भी जो हमारी जनता है, जो हम सामाने लोग हैं, जिनका उतना संपर्क नहीं है, पुराने लोगों से, या पुरानी चीजों को बचाने वाले लोगों से, उनके मन में भी कहीं न कहीं, ये सारे तत्वे किसी न किसी रूप में बचे हुए हैं, हिस्ट्री की किताबे अगर हम पढ़ें और उनको अगर हम सही में मानते होते, मन से हमने उनको स्विकार कर लिया होता, तो आज शायद हम अपने आपको हिंदू कहने में, या भारतिये कहने में और भी अधिक लजाते, लेकिन हमारे मन में कहीं न कहीं विश्वास है, कि हमारे पूर्वज गलत नहीं थे, कोई न कोई गड़बड हुई है, उसमें कोई संदेह नहीं है, बहुत सारी बाते अनुचित हुई हैं, उसमें कोई संदेह नहीं है, हमने आपस में भी अपने लोगों के साथ भी गलत किया है, हमारे साथ भी गलत हुई है, इन सब बातों में संदेह की कोई बात नहीं है, लेकिन ऐसा क्यों हुआ, इसका हम परिमारजन करने के लिए क्या कर सकते हैं, आगे हमें क्या करना चाहिए, पुरानी चीज़ों को फिर से उध्धार हमें करना है, नहीं करना है, करना है, तो किस पक्ष का करना है, और करना है, तो कैसे करना है, इन सब बातों पर विचार करने की आज हमें बहुत आविशक्ता है, अब आज का जो विशय है हमारा, वन्ड विवस्था का, वन्ड विवस्था काफी जटिल और विवादास्पत विशय है, उसमें मुख्य हेतु यह है कि यह एक ऐसा विशय है, जो हर व्यक्ति से जुड़ा हुआ है, सामानने भाषा में बात करें तो वन्ड शब्द का प्रयोग कोई नहीं करता, अधिकांचता है जाती शब्द का प्रयोग किया जाता है, जाती शब्द की अगर हम बात करें तो एकदम मौलिक अर्थ में जाएं, जाती का आशे केवल इतना है कि कोई एक या अनेक घटक, याने पेरमीटर लेकर के कोई भी क्लासिफिकेशन करना हो, उससे हम जाती बनाते हैं, जैसे हम सामाने भाषा में ऐसा भी प्रयोग करते हैं, कि मनुष्य जाती, स्थिरी जाती, पश्व जाती, इस प्रकार से भी जाती शब्द का अर्थ होता है, मूल अर्थ जाती का यही है, धीरी धीरी समय बदला, योगाद रूड ही बली यसी, ऐसा संस्क्रित में बोलते हैं, कि शब्द का जो मूल अर्थ है वो छुब जाता है, लेकिन जो लोक में प्रचारित हो जाता है, वही अर्थ उसका प्रमुख हो जाता है, जैसे पंकज शब्द है, तो कीचड में पैदा होने वाला कोई भी पदार्थ पंकज हो सकता है, लेकिन पंकज का अर्थ कमल के लिए ही लिया जाता है, उसी प्रकार से जाती शब्द भी अब रूड हो चुका है, और वो ब्रह्मन जाती, राजपूत जाती, अहीर जाती, शूद्र जाती, वाल्मी की जाती, इस प्रकार के संदर्भों में लिया जाता है, जाती को अगर हम थोड़ा और विचार करें, और ये सोचें कि पुराने शास्त्रकारों ने, पुराने आचारियों ने, महरशियों ने क्या सोच करके समाज की ऐसी विवस्था बनाई होगी, जिसको आज हम अधिकतर या तो उसमें दो सिच्वेशन है, या तो हम उसकी निनदा ही करते हैं कि ये विवस्था गलत है, इसने हिंदु समाज को बांठ दिया, सब लोगों का आपस में लड़ाई करवा दी, कहीं कुछ जो भी बुरा है वो इसी विवस्था है, या तो एक भी विचार है, दूसरा विचार है जिन लोगों के मन में पूर्वजों के लिए श्रद्धा है, या धर्म के लिए श्रद्धा है, वो इस परकार सोचते हैं कि, शायद कभी कुछ अच्छा रहा होगा, लेकिन अब बिल्कुल भी अच्छा नहीं है, आप इसे खतम कर देना चाहिए, मैं भी ये नहीं कह रहा कि इसको बचाना चाहिए, मैं क्या कहता हूं, बतातों मैं आगे, तो जाती को लेकर के इस परकार के दो मत हैं, ऐसा तो बिल्कुल भी नहीं है, कि ये बहुत बढ़िया चीज थी, या ये बहुत बढ़िया बात है, उसका हेतु, उसका मुख्य कारण ये है कि, हिंदू समाज में या सनातन धर्म में, जो भी आप शब्द का प्रयोग करें, हमारे जितने भी सिध्धान थें, चाहें वन को लेकर हो, जाती को लेकर हो, लोकाचार को लेकर हो, किसी भी विशय को लेकर हो, हम ऐसे व्यक्ति नहीं हैं, हम ऐसा समाज नहीं है, कि जहां नए शास्त्रों का या नए विचारों का दलन होता हो, या नए विचारों को प्रोत्साहित न किया जाता हो, ऐसे कितने ही शास्त्र हैं, जिनमें आरम्ब के समय में ही, अपने आचारे का समर्ण करके, तुरंथ ही डिकलेर सा कर देते हैं, कि आचारे की ये वाली बात मुझे पसंद नहीं है, ही मैं इस बात को नहीं मानता, उसके बाद में ही आगे बात शुरू करते हैं, तो हमारे यहां नए विचारों को बहुत प्रोत्साहित किया जाता है, तो ऐसा क्या हुआ, कि जाती को लेकर के पिछले 1000 सालों से या 1500 सालों से कोई नए विचाराना बंद हो गए, नए शास्त्र होना बंद हो गए, पुरानी बातों को ही हम पीटते रहे, या ऐसा सच में हुआ भी, ये भी एक संधेह की बात है, खेर, जाती को लेकर के जो दुनिया भर के नकारात्मक बाते हैं, उनका निराकरण करने का मैं प्रयास करूंगा, वर्ण की अगर हम बात करें, वर्ण का मौलिक अर्थ चुनने के अर्थ में होता है, जिसको चुना जाए, या जिसको मैं सेलेक्ट करूं इस प्रकार से, ऐसा भी नहीं कि हैरी पॉटर की थारा कोई सौटिंग हैथ है, सिर्फे रखी और वर्ण पता चल गया, ऐसा नहीं होता, परन्तु व्यक्ति की अपनी योग्यता, उसकी इच्छाएं, उसकी रुचियां, उनके आधार पर उसके वर्ण को समझा जा सकता है, वर्ण विवस्था का मूल तो वेद में है, वर्ण विवस्था का मूल वेद में किस परकार है, कि पुरुश सूखत, जो की रिगवेद, यजरवेद, सामवेद, तीनों में है, उसमें विराट पुरुश, याने के परमात्मा जिसको कहे सकते है, उससे समाज की तुलना करके, ये समझाने का प्रयास किया गया है, कि चारों वर्णों का परस्पर स्थान क्या है, उंचा-नीचा होने की बात नहीं है, लेकिन अलग-लग लोगों के मिलने से ही, अलग-लग प्रकार के लोगों से, समाज से, वर्णों के मिलने से ही सुरिश्टी होती है, तो चारों का स्थान समझाने का प्रयास किया गया है, ब्राह्मन को मुख कहा है, ख्षत्रियों को बाहु, वैश्यों को ऊरू यानी जंगाय, और शुद्रों को पैर, यद्यवपी, इसमें मज़े की बात यह है कि, जो पष्चिमी लोग हैं, पष्चिमी विचारों से प्रभाविद भी, और जो स्वाहिम पष्चिम के हैं वे लोग भी, इस बात को शुद्रों के लिए अपमान जरक मानते हैं, कि उनको तो पैर बोल दिया, अब पैर, मुझे नहीं लगता कोई भी अपने पैरों को वियर्थ या फाल्तू समझता होगा, या बिना काम की चीज समझता होगा, पैर पर्याप्त आवश्यक चीज हैं, पैरों की बिना कुछ भी नहीं हो सकता, अगर कोई अपने पैर में चोट भी लग जाया, तो भी अच्छा कासा दुखी होगा, कटाना तो बहुत दूर की बात है, उसी मंतर के बाद में दो मंतर छोड़ करके, आगे सृष्टी का और भी बताया है, उसमें पृठवी को पैरों से निकला हुआ माना गया है, और पृठवी तो देवी है, पृठवी से बढ़ करके क्या है, पृठवी देवताओं में प्रमुख है, उसकी उपासना खुब की जाती है, पूजा की जाती है, तब पैरों से आशे बुरे के लिए लेना ये केवल फरजी का प्रोपगेंडा है, इसका कोई आउचित नहीं है, खेर ब्राह्मन को मुख से तुलना इसलिए की गई कि बुद्धी का निवास मुख में होता है, प्रतिनिधी पूरे देह का मुख होता है, मुख से पहचान होती है, ख्षत्रियों को बाहू क्यों किया गया, ये सीधा समझ में ही आता है, जितना भी प्रशासन है, रक्षा है, जिसको आजकल सिविल सर्विस ये आर्मी वगरा कहते हैं, वो सब ख्षत्रियों का काम है, इसलिए ख्षत्रियों की तुलना बाहूं से की गई, उरू यानि जंगहाउं से वैशे की तुलना इसलिए की गई, कि जितना भी हमारे देह का वजन है, भार है, वो पूरा का पूरा जंगहाउं पर ठेका रहता है, और समाज का भार अर्थ से चलता है, यानि पैसे से चलता है, उसका पूरा दाईतो वैशें के हाथ में है, और यह बहुत बड़ा ही प्रचार है, और यह बड़ा ही विजित्र प्रचार है, कि शूद्र माने बुरा, शूद्र माने बिना बुद्धी का व्यक्ति, शूद्र माने जो कुछ नहीं कर सकता, जो असफल है, इस प्रकार की तुलना शूद्रों से की जाती है, अगर हम चारो � अथारोणों के दाईत्व उनके कर्म और उनके अधिकार देखें तो इस बात में बिल्कुल भी आधर नहीं मिलता है ब्रहमन याने कौन हुआ ब्रहमन याने बुद्धी तो सबके पास होती है कम हो चाहिए जादा हो बुदधी के बहुन बहुन बुदधी कर जा नहीं चलता आगर वो जाधा है तो वो बहुन बहुण चल नहीं चीखे ख़र भूनल ब्रहममनी। दिमाग है उसके सtake योगेता है तर कोमों removed जलबे जू भरमन नहीं होका पहले ऐसा इसलिए कर सकते थे कि उन्हें विश्वास था कि समाज उनकी साहिता करेगा जब उनका घड़ा खाली होगा तो समाज अस घड़े को भर देगा इससे अधिक उनको अपेक्षा भी नहीं थी, इससे अधिक उनका अधिकार भी नहीं था वैसे ही ख्षत्रिय कौन हुआ तो ख्षत्रिय वो हुआ जो समाज की व्यवस्था को देखे व्यवस्था से सुरक्षा के संवन्द में व्यवस्था राजनीतिक व्यवस्था ये सारा आशय है वैसे वो हुआ जिसका काम है अर्थ का उपारजन करना अर्थ का उत्पादन करना एक प्रकार से यद्यों पे कोई नौकरी करता है वो भी पैसा कमाता है लेकिन नौकरी करने वाला वैसे नहीं हो सकता क्योंकि जिसको आजकर हम एंटर्पिनर कहते हैं वो वैसे हुआ अब शुद्र की बात आती है इस विशय को हमेशा चुपा देते हैं दबा देते हैं और ऐसा प्रज़ेक्ट करने का प्रयास करते हैं कि शुद्र माने जो जाडू पोंचा या ये शौच वागेरा से सम्बंदित काम करता है बस वो शुद्र है बागी तो कोई शुद्र नहीं है अभिकि ऐसा नहीं है श्रौत शूत्र के भाषे में श्रौत शूत्र हमारे जितने भी कर्मकांड है यागनी का कर्मकांड उन में प्रमुख गरंथ है श्रौत शूत्र उनके भाषे में सास्रो नहीं तो सैक्रों वर्ष पहले आचारे कर्क ने इस प्रगार का एक उल्लेक्स किया है कि शिल्पो पजीवनं प्रतिशिद्धम त्रैवनिका नाम यानी कि जो तीन वर्ण हैं ब्रह्मन, ख्षत्रिय और वैशिय उनका शिल्प यानी इंजिनेरिंग उपजीवन यानी कि उससे अपना जीवन चर्या चलाना उससे अपना जीवन यापन करना वो बैंड है यानी इंजिनेरिंग एक्स्लूसिवली शुद्रों के लिए रिज वो तो ब्रह्मनों का काम हुआ इसके लाभा दुनिया में और भी सेक्डों हजारों काम होते हैं मालिजी कोई अभिनेता है कोई संगीत अच्छा गाता है कोई अच्छी मूर्थी बनाता है, कोई चितरकार है कोई अच्छे वस्तर बनाता है, इस परकार के बहुत सारे काम जिसको Manufacturing Industry कह सकते हैं जिसको Engineering Science कह सकते हैं जिसको Architecture भी कह सकते हैं इसलिए जो दुनिया भर के Fields हैं, Domains हैं संख्या में यही सबसे अधिक है और यही कारण भी है कि शुद्रों की संख्या आज भी सबसे अधिक है एब्सलूट नंबर्स में भी और परसंटेज में भी तो इस वज़ा से यह समझ में आता है कि ऐसा नहीं है कि शुद्रों के साथ में हमेशा कुछ गलत ही हुआ या केवल जाडू पूछा करने वाले लोगी शुद्रों की शुद्रों होते हैं बाकि कोई शुद्रों नहीं है यह बहुत भेंकर मिठ्या प्रचार है दूसरी बात यह भी है कि यह जो शवुचादी का काम है जो सबसे ज़्यादा निंदित है और जिसकी वज़ा से जो शुद्र वर्ग के दिमाँ में भर्डिया गया है कि आप लोग तो यही काम करते है यह काम भी ऐसा नहीं है कि बहुत प्राचीन समय से चला आ रहा है जब से शहरी करन थोड़ा बड़ा आयितरे ब्रह्मन में एक बड़ा ही रोचक प्रसंग आता है वो कहते हैं कि असुरों के नगर शहर बहुल यानि के नगर बहुल होते हैं यानि उनमें नगर अधिक होते हैं और देवों के नगरों में ग्राम अधिक होते हैं ग्राम होने से व्यवस्ता एकड़म बदल जाती है कि शुद्रों को शवुचा दी ये सारे विशे जो आपती जनक हैं अपने हाथ में लेने पड़े तो ऐसा नहीं है कि एकड़म शुरू से ही ब्राह्मनों ने बहुत पहले कॉंस्पिरेशी की या दूसरे वर्गों ने कॉंस्पिरेशी की कि हम तो हैं इन लोगों का शोषन करेंगे ऐसा कुछ नहीं है वणों की जब बात चलती है तो शतपत ब्राह्मन में एक प्रसंग आता है स्रिष्टी के आरम्भ में सभी ब्राह्मन थे इस प्रकार का उल्लेक है ब्राह्मन थे समाज फैलना शुरू हुआ संख्या बढ़नी शुरू हुई लोगों की रुचियां बदली नए ने प्रकार के लोगों ने जन्म लिया तब समझ में आया समाज की नेताओं को केवल ब्राह्मनों से तो दुनिया नहीं चल सकती और भी चीज़ों की आवश्यक्ता है उनकी विवस्था कैसे होगी तब ख्षत्रिय वन का स्रिजन हुआ वन का स्रिजन से यहां तातपर ही यह है कि उल्लेक तो वनों का वेद में आरंभ से है वेद तो सृष्टी के आदी से है परन्तु वन का स्रिजन हुआ यानि कि उसका अपलाई करना शुरू हुआ समाज में उसको समाज में प्रयोग करना शुरू हुआ वेद में बहुत सी विद्ध्याएं हैं लेकिन सारी विद्ध्याएं सब समय प्रयोग में नहीं आती तो ख्षत्रिय वन का तब उद्गम हुआ थोड़े समय तक ऐसे ही विवस्था चली धीरे धीरे लगा कि इतने से भी काम नहीं चलेगा और भी करना पड़ेगा तब फिर वैशे वन का उद्गम हुआ वैसे ही विवस्था चलती रही और कुछ समय के बाद में तब समझ में आया कि शूद्र भी वन चाहिए ये चार वन होने के बाद में समझ में आया कि चार के बाद में पांच वन नहीं चाहिए इन चारों से सारे काम समाज के चल सकते जो हमारे पूर्वज गिशी थे जो हमारे पूर्वज आचार्य थे उन्होंने विचार किया कि समाज को किस परकार से संतुलित चराया जा सके अब समाज में सबसे बड़ी जो कॉंफ्लिक्ट हैं उनमें एक तो ये है कि इंडिविजूल वरसे सोसाइटी नीजी व्यक्ति की चाहते हैं कई बार उसके परिवार के या उसके कुल के या उसके आस पड़ोस के या उसके देश के विरोध में हो सकती है और होती भी है और कई बार ऐसा हो सकता है कि इंडिविजूल सही हो कई बार होता है कि सोसाइटी के हित के लिए इंडिविजूल को थोड़ा दुख जहलना पड़े तो जहलना चाहिए ये सारी बाते सेनेरियो बेस्ट होती है लेकिन आदर्श स्थिति वो है कि जब दोनों में आपस में स आपकी जन्सकालगेर लैगिए डेस्ट के जड़ि जैंसार का वीक्कित्ल जैंसर के आदर्श गी अदर्शन के जन्सकाल और आपका नुचिन की वान है जहलनर में जाति को इंडि़ी एकदम दिमाग को शान्ती मिल गी मुझे आनसर मिल गया यह बुरा है बस मैं आराम से शान्ती में आ गया दूसरा फिर दूसरी तरफ ये भी लोग हैं जो इन चीजो के लिए जान भी देने को तारू हो जाते हैं उनको वहाँ आराम लगता है कि ये सब चीजो पुरानी जो थीं सब एकदम सही थी कुछ भी कभी गलत हुआ ही नहीं इसको ऐसा मान लेते हैं तो भी एक आनसर मिल गया आपको आनसर मिल गया तो आपको शान्ती मिल गया आपका सवाल हल हो गया अब बस उसका पालन करना है कई बार उसका पालन करना जादा सरल लगता है बजाए कि जवाब को खोजने के खेर तो जाती की बात में कर रहा था ऐसा हो सकता है कि एक वंड में अनेक जातीयां आती हो और इसका उल्टा भी हो सकता है कि एक जाती में भी एक से अधिक वंड देखने में आए जातीयां समय के साथ में बनती भी हैं विगर्ती भी हैं नष्ट भी होती हैं लेकिन वंड कभी ऐसा नहीं होता वंड हमेशा है हमेशा रहेगा चाहें उसका धार्मिक पक्ष आज के समय में नष्ट हो चुका है आज के समय में कोई ब्रह्मन वेद पढ़े या पढ़ाए ऐसा अधिकतर नहीं होता है परसंटेज वाईस बात करें तो बहुती नगण्य संख्या है नहीं आज के समय में ऐसा है कोई शूद्र कला पेमी हो या शिल्प पेमी हो ऐसा बिल्कुल भी अवश्यक नहीं है धार्मिक पक्ष तो नष्ट हो चुका है लेकिन इनका जो व्यावाहारिक पक्ष है समाज में हमेशा एक ऐसा वर्ग रहेगा जो नेरेटिव क्रेट करेगा समाज में हमेशा एक ऐसा वर्ग रहेगा जो आपको बताएगा कि अच्छा क्या है बुरा क्या है आम आदमी तो वैसे भी जीवन में इतना व्यास्थ है कि वो फिल्म देखने के लिए भी रिव्यू देखता है फिल्म कभी तो देखे बिना पता नहीं चलता है अच्छी है और बुरी है तो इतने बड़े बड़े विशय धर्म से लेकर के जीवन से लेकर के ये सब कहां से समझ में आने वाले हैं सीधा सीधा तो आम आदमी की तो दूर गती है हर जगा खेर बुद्धी जीवी वर्ग उसको मुख इसे लिए कहा उसको प्रमुख इसे लिए कहा कि वो समाज को दिशा देता है क्या गलत है क्या सही है इसका बोध घराता है वो वर्ग हमेशा रहेगा चाहें वो बुरा हो चाहें वो अच्छा हो चाहें वो आज भारत में कम्यूनिस्ट डॉमिनेटेड हो या कैसा भी हो वर्ग वो रहेगा हमेशा रहेगा ऐसे ही ख्षत्रिय वर्ग है वो भी हमेशा रहेगा ही रहेगा भले उसका धार्मिक पक्षन अश्ट हो गया हो तो वर्ण तो चारों रहेंगे लेकिन जातियां बनती और विगरती रहती हैं अब मनुस्मृति में या महाभारत में बहुत सी ऐसी जातियों को उल्लेक आता है जिनका आज नाम भी नहीं मिलता जातियां बनने के बहुत सो उधारण अगर आप थोड़ा सा गाउं की तरफ निकले तो आपको थोड़े ही समय में पता चल जाए के दो तीन सो सालों में भी नई जातियां भी बनी हैं पुरानी खतम भी हुई है जैसे हमारे गाउं की तरफ एक जाति होती है बाबा जी तो बाबा जी उनको इसलिए बोलते है कि उन लोगों में ऐसा रहा कि शुरू में ऐसे कई लोग होई जिनोंने सन्यास ले लिया पर उनसे सन्यास निभाय नहीं गया तो वापिस आ गए और घर बसा लिया तो अब उनके लिए बड़ी दुविदा हुई कि इनको क्या माने तो क्योंकि उनोंने आश्राम धर्म का उलगन किया इसलिए उनको पहले वाला स्टेटस तो दे नहीं सकते थे पर क्योंकि हम दूसरे प्रकार के लोग नहीं हैं हम people of the book या ऐसे rigid टाइप के लोग नहीं हैं हम बदलने वाले लोग हैं सही दिशा में बदलने वाले लोग हैं इसलिए उनने कोई स्थान तो देना ही था तो उनको स्थान दे दिया गया उनको बाबा जी बोल दिया गया कि ये बाबा जी लोग हैं यादव जो हैं हर्याणा के यादव एक दम अलग हैं बहुत ही सज्जन या बहुत ही विनम्र व्यवसाई प्रकार के लोग माने जाते हैं UP और बिहार के यादव एक दम अलग प्रकार के माने जाते हैं तो ऐसे उधार्णा कर आप देखने निकले तो कोई समाप्पी नहीं है ये सब इस बात का प्रमाण है कि हिन्दु धर्म जीवित है कुछ भी यहाँ पर सेटिन स्टोन टाइप का नहीं है कोई टेन कमाण्डमेंट्स टाइप की कोई बात नहीं है जैसे जैसे समय चलता है वैसे वैसे हम व्यवार करते जाते हैं हाँ ये बात है कि वेद हमारा मूल ग्रंथ है परन्तु वेद सीधा सीधा वेद याने के बहुत थियोरम वाली भाषा में कही है जैसे कही है बहुती बेसिक लेंग्विज में है वेद में कुछ भी ऐसा नही है कि बड़ा एजी एजी बता दिया. अब अती है, जो मैं कहे रहा था भी अती बादवाली बाद कुछ लोग ऐसा प्रयास करते हैं बताने का कि जैसे वेद में बिल्कुल लिखाई है कि कैसे बनेगा? तो वैसा भी नहीं है और कुछ लोग ऐसा प्रयास करते हैं कि वेद में बिलकोल ऐसा ही लिखा है कि दूसरे का बुरा ही बुरा हो और मेरा सब अच्छा ही अच्छा हो ऐसा भी नहीं है खेर जातियां बनती बिगरती रहती हैं अब कुल के आधार पर भी कई बार वन का परिवर्तन हो जाता है शिवाजी का जैसे सबी लोग नाम जानते हैं शिवाजी का कुल तो उच्छ था पहले से सिसोधिया वंश के थे पिता की ओर से परन्तु जैसा जैसा समय बीटता गया उनके कुल की श्री गई उनकी संपत्ती वगरा सब चीज़े धीरी धीरी गई नठते गए तो शूद्र माने जाने लगे उनका उपनायन कराना भी एक बड़ा भारी काम हो गया था उनके समय में भी जबकि वो राजा थे तब भी परन्तु उनोंने अपने कुल का उध्धार किया उनोंने फिरसे अपना सामर्थ्य प्राप्त किया और इस प्रकार से उनका वर्ण बदला ऐसे ही इतिहास में इंडिविज्वल स्थर्पे भी बात करें तो बहुत से उध्धारंड मिलते हैं चाहें विश्वामित्र हो या विश्वामित्र तो फिर भी ख्षत्रिय थे पहले चाहें हम आईतरेय की बात करें महरशी आईतरेय जिनके नाम से आईतरेय ब्रह्मन है महीदास आईतरेय शुद्रा के वो पुत्र थे उसके बावजुद उन्होंने वेद अधिका अध्येन करके अपना वर्ण बदला ऐसा नहीं है कोई वर्ण हमें है तो वो बुरा है ऐसा नहीं है कि शुद्र होना बुरा है या ख्षत्रिय होना बुरा है घीता में कृष्णु ने जो कहा स्वधर्मे निधनंश्रेयः परधर्मो भयावः धर्म से अशे हिंदु, मुस्लिम, सिक्षी, हिसाई तो नहीं था अशे धर्म से प्रकृति से था धारणाद्धर्मः ऐसा जो बोलते हैं धारणाद्धर्ममित्याहु इस प्रकार से एक सूक्ति है तो जो मेरा योग्यता है, जो मेरी प्रवरित्ती है, जो मेरा नेचर है अगर मैं उसमें रहुंगा, तो काफी अहर तरह से मैं प्रकृति कर सकता हूं बढ़िया तरीके से अपना जीवन बिता सकता हूं लेकिन अगर मैं जो नहीं हूं वो बनने का प्रयास करूंगा तो अपनी भी दुर्गती करूंगा और अपने साथ वालों की भी करूंगा तो क्रिशन का आश्य वहाँ पर यही है कि अपने धर्म में अपनी प्रवरित्य का पालन करो और उसे साथ से अपना जीवन यापन करो खैर, तो जातियों की जो बात थी कि जातियां कुल का विस्तार हैं और वन उन सब को व्याप्त करता है तो वन किस प्रकार से व्याप्त करता है मालिजिये कि अब इसमें भी फिरोई अतिवाद वाली बात लोग इस प्रकार से मानना चाहते हैं कि एकदम सीधा सीधा मेरा आज मन हुआ कि मैं तो जी ख्षत्रियो बनना चाहता हूं और बस मैं ख्षत्रियो हो गया, ऐसा थोड़ी होता है तो किसी भी तरह से, अगर आधनिक परिपेख्ष में इसको देखे बच्पन में बहुत सारी चीज़े बनने का मन करता है दस्वी, ग्यारवी, बारवी तक भी खास करके ये भी बन जाओं, वो भी बन जाओं, सब कुछ बन जाओं एक मेरा फ्रेंड है, उसने तो लिटरली यही लिग दिया था, मैं सब बनना चाहता हूँ पर ऐसा नहीं होता है योग्यता के आधार पर, पुराने संसकार के आधार पर, इन सब चीज़ों के आधार पर हम कोई वियावार करते हैं, या किसी चीज़ के लिए योग्य बनते हैं ब्राह्मन बनना है, उसमें कुछ विशेश बात है, असा नहीं है शत्रिय बनना है, उसमें कुछ विशेश है, असा नहीं है वन केवल इन चारू बातों से जुड़ता नहीं है वन को जो हम प्रकृति के मूल गुण बोलते हैं, सत्वा, रजस और तमस उन सब से भी वन का जुडाव है ब्राह्मनों में सत्व प्रधान मानते हैं, शत्रियों में रजस प्रधान मानते हैं वैशों में रजस और तमस और सुद्रों में तमस प्रधान मानते हैं ऐसा नहीं है कि तमस कुछ बुरा है रजस को इस प्रकार समझें आप कि रजस याने के मूव्मेंट याने के कुछ करने की इच्छा, कर्म की इच्छा, इस प्रकार से रजस को समझें तमस को इस प्रकार से समझें कि शान्त रहना या इनेक्टिव रहना या पैसिव रहना इस प्रकार से आप तमस को समझें इन दोनों में जो संतुलन बनता है तब सत्व का प्रादूरभाव होता है तो इस प्रकार से भी वन चारो वन को व्याप्त करता है एक अगर हम व्यक्ति की भी बात करें इंडिविज्वल की तो इंडिविज्वल के अंदर भी चारो वनों के गुण होते हैं ऐसा नहीं है कि कोई आदमी ब्राह्मान है तो 100% ब्राह्मान है कोई शूद्र है तो 100% वो शूद्र ही है एक व्यक्ति में भी चारों के गुण होते हैं प्रधान जिसका होता है वो उसका वंड कहलाता है राजा जनक का नाम शायद सबने सुना ही होका राजा जनक बहुत बड़े विद्वान व्यक्ति रहे कई ब्राह्मानों से अधिक उनकी बुद्धी थी ये नहीं कि सबसे बड़े विद्वान थे लेकिन बहुतों से अधिक विद्वान भी थे पर फिर भी उनको कभी किसी ने सामाने ब्राह्मान भी नहीं कहा उनको ख्षत्रिय ही माना गया क्योंकि उनका काम वही था उनकी रूची वही थी अब बहुत ही सामाने भाषा में बात करें तो एक शब्द होता है हिंदी में मेहतर और एक होता है मेहतारी मेहतारी शब्द जो है वो मा के लिए प्रयोग में लिया जाता है राम चरितमान उसमें स्तुति भी आती है भै प्रगटकरपाला उसमें भी मेहतारी शब्द का प्रयोग किया जाता है और मेहतर कहते हैं जो जाडू पोचा या सफाई करता है घर की, गली की, नालों की उसको भी मेहतर कहते हैं मेहतारी मा को इसलिए कहते हैं क्योंकि वो भी अपने शिषू का पूरी तरह से उसकी गंदगी उठाती है इस सब कारणों से उसको मेहतारी कहते हैं चारो वर्णों के जो गुण हैं वो व्यक्ति के जीवन में कभी ने कभी आते हैं हर समय आते हैं जो प्रधान रहता है उसके सापसे वो अपना जीवन चलाता है अब इस सब को लेकर के एक प्रचार ये भी है और ये बड़ा ही भैंकर प्रचार है जो मैंने पहले भी कहा के सूद्र माने जो कुछ पढ़ा नहीं सकता उसको ये बात सच है कि सूद्रों को वेद पढ़ना मना है इसमें कोई संदेए नहीं है पुराने आचार्योंने मना किया है कि सूद्रों को वेद न पढ़ाये जाए केवल सूद्र की की बात नहीं है मैंने खुद भी देखा है अपना ही पुत्र अगर योगी न हो तो उसको भी वेद नहीं पढ़ाते हैं ब्राह्मन भी चाहें कितने ही पारंपरिक होयें कुछ भी हो अगर योगी नहीं है तो अपने पुत्र को भी नहीं पढ़ाते हैं उसका कारण इसलिए है कि वेद बहुती मौलिक ग्रंथ तो मैं नहीं कहना चाहूंगा पर और कुछ शब्द भी नहीं है दिमाग में वेद एक बहुती मौलिक पढ़ार्थ है या सब चीज़ों का आधर वेद में ही है इसलिए उसको किसके पास में देना है कौन उसकी रख्षा करेगा यह बहुती दाईतव वाला काम है तो वेद पढ़ने का तो शुद्रू को मना है इसमें संदेए नहीं है परन्तु वेद के लावा और भी दुनिया भर के विशय है और भी चीज़े है और फिर वेद पढ़ने में एक बड़ी मज़ेदार बात यह है कि आजकल तो सो सो रुपे में मिलते हैं फिर भी कोई नहीं पढ़ता तो पढ़ना भी कोई चाहे अगर तो एक दो दिन में या सपते दस दिन में समझ में आजागा कि पढ़ना हमारे बस का नहीं है तो ऐसा नहीं है कि पहले लोग तडब रहे थे एकड़ों वेद पढ़ने के लिए मरे जा रहे थे और ब्राह्मानों ने बोला भाग जाओ यहां से समस्या यह है ना कि जो हमारा संप्रदाय है या हमारा धर्म है यह जीवित है बदलता है और इसको देख कर कि यह जीने का विशय है पढ़ने का विशय नहीं है वेद भी जीने का विशय है पढ़ने का विशय नहीं है लेकिन हमारे उपर जो हावी है विचार पस्चिम के वो हमें इस बात के लिए विवस्च करते हैं कि हम हरी चीज को फट से पढ़ करके ही समझ लें कि हाँ जी यह चीज ऐसे है यह चीज ऐसे है और बस हो गया जीने से जो चीज समझ में आती है जो मैं पहले भी कह रहा था क पुस्तके पढ़ के जो चीजें समझ में नहीं आती हो आप एक सप्ता मत्तूर में रह जाएँ आपको समझ में आजाएंगी तो वो बात इसलिए है कि हमारे जितने भी विचार हैं वो सारे आचार में जैसे एक सुक्ति और है संसक्रित में आचार रहा परमो धर्मः तो आचरण से देखने से आचार पर बहुत बल दिया गया हर जगा आचार के लिए इतने सारे स्मृति ग्रंथ लिखे गए हैं महाभारत से भी बड़े बड़े स्मृति ग्रंथ हैं महाभारत जब कितने बड़ा लगता है कि हमारा आचार ठीक रहे, आचरण ठीक रहे उससे जो ग्यान आता है, जो चीज़ों बहुत स्वाभावेक हैं, बेसिक हैं जैसे मालिजी कमरे में कोई बड़ा आया उसको देख कर के चोटा खड़ा हो गया और उसको बैठने के लिए आसन दिया यह बहुत बेसिक आचार है, यह तो हम अभी भी करते हैं पर देखने वाले न इसको फट से देख लिया, बच्चपन में ही देख लिया, सीख लिया लेकिन आप कितावे पढ़के कितना भी कर लिए, अगर आपको समझ में आ भी गई तो वो आपको याद रहेंगी, यह कोई आवस्चक नहीं है जैसे कभी अगर आपको अवसर मिले और सोमयाग वगरा देखने का अवसर मिले या कोई इश्टी वगरा देखने का अवसर मिले तो उसमें आप समझेंगे कि बहुत से ऐसे विशे हैं, जो छोटे-छोटे बच्चे, चार-चार पांच-पांच साल के बच्चे जानते हैं और समझते हैं जिसके उपर पीछडी करते हैं लोग, संस्कृत कॉलेज में जा करके और अच्छा-खासा स्टाइपेंड लेते हैं और वो बाते उन छोटे-छोटे बच्चों को अच्छी तर समझ में आती हैं क्योंकि उन्होंने अपने बड़ों को करते हुए देखा हैं, उनका महत्व जानते हैं खेर, तो अब ये जो प्रचार है कि शूद्रों के साथ हमेशा बुरा हुआ या उनको वेद पढ़ने की अनुमती नहीं थी, ठीक है, अनुमती नहीं थी, उसमें कुछ संदेय नहीं है लेकिन वेद के लाब और दुनिया भर के जो विशें हैं, जो विध्याएं हैं, जिनके बारे में कुछ चर्चा ही नहीं करता, सीधा एकडम ब्रह्मन माने साइंटिस्ट, ख़त्रिय माने आर्मी में, वैशे माने बिजनिस्मैन, और उसके लाबा दुनिया में कुछ होता नहीं है, उसके लाबा सिर्फ जाडू करने वाला होता है तो ऐसा तो नहीं ही है तो जो शुद्रों के लिए वेद वाली बात है अब इस परकार का भी प्रचार करते हैं कि शुद्रों को वेद सुनने पर उनके कानों में सीसा पिगला या लेड पिगला करके डाल दो या उनकी जीब काट लो इस परकार के दुनिया भर के कुछ भी जो बोलने में अच्छा लगता है वो बोलते है इसमें basic contradiction बड़ी जल्दी दिखाई देने लग जाते हैं अगर आप थोड़ा भी देखें जैसे अभी मैं सोमयाग की ही बात कर रहा था केवल सोमयाग ही नहीं और भी जितने चोटी मोटे कर्म होते है उनमें by default स्रगत सुत्रों में भी इस परकार का नियम है कि एकड़म ठीक रहते हैं तो इस परकार की बहुत सी basic बाते हैं जैसे मंदिर बनाने का काम ही हुआ शिल्प का काम हुआ आप अगर सुत्रों मंदिर बना रहा है तो उसके कानों में वेद मंत्र पढ़ रहे हैं बोलते हैं कि संस्कृत जो है मृत भाषा है या संस्कृत केवल ब्राह्मनों की भाषा रही पर पुराने जितने भी आप नाठक पढ़ेंगे या बुद्ध ग्रंथ भी पढ़ेंगे जो कि एक तरह से कहें तो हला कि बुद्ध के निजी जीवन में ऐसा कुछ नहीं मिलता लेकिन बात का नेरेटिव यही है कि बुद्ध ब्राह्मन विरोदी थे या इस परकार की बात बुद्ध का यह वक्तवे तो मिलता है कि जैसा वेद को ब्राह्मन बताते हैं वैसा वेद को मैं नहीं मानता पर बुद्ध का ऐसा कुछ नहीं है कि सारी गलती ब्राह्मनों की टाइप का ऐसा बात का ही नेरेटिव है खेर तो जो आपके सूद्र वर्ग है उसके साथ में इस परकार का कभी कोई अत्याचारी अगली बार आपको फिर से आलस आएगा और आप सोझे इसकी टेंडेंशी बढ़ जाती है आपके अंदर वो संसकार थोड़ा आओ अगली बार आपको फिर से आलस आएगा और आप सोझे एक कहावत कहते हैं संस्कृत में कि अतलब कि जब सर्वनाश दिखाई देता है सामने जब लगता है कि सब कुछ खतम हो जाएगा कुछ भी नहीं बचेगा तो आधी चीज़ को पंडित छोड़ देता है पंडित यानी विद्वान व्यक्ति पंडित यानी ब्राह्मन छोड़ देता है ऐसा नहीं सभी लोग ऐसा ही करते हैं इसमें समस्या बस है ऐसा होता है वो बात ठीक है लेकिन समस्या ही है कि कौन सा आधा छोड़ा सही वाला आधा छोड़ दिया तो और जदा दिक्कत हो जाती है वैसा कोछ हुआ है हमारे समाज के साथ में कि जो जो सही बाते थी वो हमसे छूटते गईं धीरे धीरे और दुष प्रचार इतने भेंकर बढ़ते गया भी थोड़ दिन पहले भी एक किसी ने आर्टिकल लिखा पर ये प्रचार तो काफी पुराना है कि केरल में जो ब्राह्मन महिलाएं नहीं थी शूद्र महिलाएं वगरा थी उनको उपर के वस्तर पहिनने के लिए राजा ने मना कर दिया और उनमें एक महिला दुखी होगी वगरा वगरा इस प्रकार की कहानी निकली जब की आल्टर अफ़ायर नाम से एक डॉक्यूमेंट्री है यूट्यूब पर 1972 में आतिरातर वो भी एक प्रकार का सोमयाग है केरल में किया गया और उस समय ऐसा माना गया कि शायद ये आखरी बार हो रहा है तो 1975 की है कोई पुरानी डॉक्यूमेंट्री ये ऐसा नहीं है कि 200-300 साल पुरानी तो उस डॉक्यूमेंट्री को अगर आप देखेंगे उसमें भी आप नोट करेंगे कि यजमान पत्नी जो ब्रह्मन ही है वो कई बार कई इंस्टेंसेस में उसने भी उपर का वस्तर धरन नहीं किया है वो इसलिए क्योंकि हमारा आचार इस परकार का था पहले इस चीज़ को ऐसा बहुत जदा जैसा आजकल एक दूसरा परकार का प्रचार इन सब बातों के साथ जोड़ा गया है या जो विक्टोरियन कंस्ट्रक्स है जैसा भी आप समझें उसको ऐसा नहीं था पहले लेकिन प्रचार इस परकार का किया गया कि दलिदों के साथ तो इतना बुरा किया गया अब आजकल के जो लोग हैं आजकल के हम जो लोग हैं उनको ये बात बड़ी ओफेंडिंग लगेगी जब तक कि हम नहीं जानते कि पुराने लोग ऐसा सोचते थे तो इस परकार के और भी अनेको प्रचार किये जाते हैं अब इसका रिफ्यूट करने के लिए तो हम बहुत सारे उधारन दे सकते हैं लेकिन बात यह है कि उन उधारन में से नेरेटिव कंट्रोल करने वाले लोग जो हैं कितनी हमारी बात को आगे तक पहुंचाएंगे और कितनी उनकी अपनी बात को आगे पहुंचाएंगे इसको हम नियंट्रिट नहीं कर सकते क्योंकि हमारा जो बुद्धीजीवी वर्ग है देखिए कोई भी समाज हो चाहें आप किसी बी तरह से समाज को फिर से वोई जाती में बांटें या वर्ग में बांटें कि ये वैग्यानिकों का समाज है या ये सरकारी नोकरी वालों का समाज है या ये हिंदुओं का समाज है या ये उतर प्रदेश वालों का समाज है किसी प्रकार से बांटें हर समाज में भी फिर से आपको चारूं वर्ड वाले केरेक्टर देखने को मिलेंगे हर समाज में एक बुद्धीजीवी वर्ग होगा जो समाज के आदर्शों को पालता होगा जो उस समाज का आप्तपुरुष कहा जा सकता है कि हमारे समाज के या हमारे धर्म के या हमारे समुदाए के जो जो आदर्श हैं कि ये बाते हम सही मानते हैं उन न बातों को अपने जीवियों में पालन करता होगा ऐसा एक वर्ग आपको मिलेगा हिंदुवों में ऐसा वर्ग उसको ब्राह्मन कहते है कि जिसके लिए योगी तो एक बार को ना भी हो परन्तु उसका प्रयास ही रहेगा कि वो योग के आठवंगों का पालन करे परिग्रह बिल्कुल ना करे धर्मशास्तर का अध्यन अध्यापन करे परन्तु हमारा दुरभाग्य ये है कि हम हिंदु बने रहने तक के लिए ही संगर्ष कर रहे थे ऐसे में हमारे आदर्शों को समालने वाले लोग हों ये तो असंभव सी बात हो गई भिशेश करके पिछले 200-250 वर्षों से जब से अर्थ विवस्था भी एकडम बदलने लगी जब ऐसा वर्ग हमारे पास से नष्ट होने लगा तो जो इस वर्ग के अवशेष थे एक नील कंठा शास्त्री हुए वारणशी में बहुत बढ़िया विद्वान थे परन्तो उनकी कुछ ऐसी विवस्था बनी आर्थिक कहिए है जो भी कहिए कि उन्हें अफिशियली ये डिकलेर करना पड़ा कि मैं क्रिशियन हूँ उन्हें बाइबल का संस्क्रित में अनुबात भी किया तो ऐसा नहीं कि बाद में उन्हें रिक्रेट किया वापिस कोई सुधार किया ऐसा हो गया बस हो गया खतम बात इस प्रकार तक कि हमारी दुरगती हुई है ऐसे में अगर हम ये चिंतन करें कि पहले के लोगों ने सब कुछ घलक किया जानबूच के किया ऐसा नहीं करना था वैसा नहीं करना था तो वो उनके साथ में अन्याय होगा जब आज के समय में सारी चीज़े अनुकूल होते हुआ अनुकूल याने कि कम से कम इंडिविज्वल स्थर पर तो हमारी लिए बहुत कुछ अनुकूल है कम से कम हमें इस चीज़ की चिंता नहीं है कि कल को लड़ाई हो जाएगी और हमारा घर परिवार तक बचेगा नहीं इस लड़ाई अगरा के भैसा यहां तक भी हुआ कि रात्री में विवाह करने लगे उतर भारत में जबकि रात्री में विवाह करना किसी बी तरह से सेंसेबल नहीं है प्रैक्टिकल भी नहीं है लेकिन करने लगे आगे हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि जो भी कुछ हुआ उसको हम किस प्रकार से सुधार सकते हैं और किस प्रकार से आगे के लिए अपलाई कर सकते हैं अब 1820-25 के आसपास में अंग्रेजोने एक सर्वे करवाया दक्षिन्ड भारत में भी और बंगाल में भी और भी कहीं करवाया हो तो अभी मुझे पढ़ने को नहीं मिला पर यहां का मैंने पढ़ा है उस सर्वे में उन्होंने जाती के हिसाब से भी विवस्था बनाई कि कितने चात्र हैं, कितने अध्यापक हैं कौन कौन विषय पढ़ाये जाते हैं, इस्त्रियां कितनी पढ़ती हैं पुरुष्य कितने पढ़ते हैं, कितने आयुवर्ग के लोग पढ़ते हैं बहुत ही डिटेल्ड सर्वे है उसमें कोई संधे नहीं है लेकिन वो सर्वे पुरी तरह से हमारे पक्ष में है कौन कौन विषय पढ़ाये जाते हैं, इस्त्रियां कितनी पढ़ती है पुरुष्य कितने पढ़ते हैं, कितने आयुवर्ग के लोग पढ़ते हैं मैं हुँ एसा एसास होना कि मैं हुँ आई एक्जिस्ट मैं हुँ एसास होना कि मैं हुँ आई एक्जिस्ट एक मेरे खाल से लैटिन में एक उक्ति भी है कोगीटो एर्गोसम एक मेरे खाल से लैटिन में एक उक्ति भी है कोगीटो एर्गोसम I think therefore I am तो मेरे होने का जब मुझे एसास होता है तो मेरे सामने अगला प्रशन आता है कि मैं कौन हुँ मैं हुँ इतना तक तो ठीक है लेकिन मैं कौन हुँ अब मैं कौन हुँ इसके बहुत सारे स्थर पर उत्तर हो सकते हैं मैं किसी का पुत्र हो सकता हूँ, किसी का भाई हो सकता हूँ मैं अपनी वृत्ति से, अपनी नौकरी से कुछ हो सकता हूँ, मैं अपने समाज में कोई स्थान रख सकता हूँ मैं राजनितिक रूप से कुछ हो सकता हूँ बहुत सारे उत्तर इसके हो सकते हैं लेकिन इसका सबसे मॉलिक और बेसिक उत्तर है जो इसका हमेशा होता ही होता है बाकि कोई उत्तर हो नहो तो वो उत्तर यह है कि मैं किस का पुत्र हूँ माता के अर्थ में भी और पिता के अर्थ में भी कि मेरे होने का कारण क्या है या मैं किस के कारण से मैं हूँ यह सबसे मॉलिक उत्तरों में से है अब इस उत्तर को जब आप खोलने निकलेंगे तो आप परिवार से जोडेंगे माता पिता से प्रेम होगा और थोड़ा जोडेंगे तो आपको अपने कुल से प्रेम होगा और थोड़ा विस्तार करेंगे तो फिर आपको अपनी जाती से लगाब होगा कि मैं आमों कमों जाती का हूँ हाला कि आजकल जैसे जैसे परिवार विवस्ता नस्थ हो रही है तो परिवार से प्रेम रखना भी जाती की बात अलग है जाती तो केवल राजनितिक प्रयोग के लिए रह गई है जातीं बनती बिगरती रहेंगी उसमें चिंता नहीं है लेकिन वण विवस्ता को हम समझें इसको समझलें और इसको आगे कैसे बढ़ाएं उसके लिए हमें अब जो विशे है हमारे सामने वो यह है कि पस्चीम के जो लोग हैं अब बहुत सारी बाते निकल के आती हैं उसे कई सारी conspiracy theory लगती भी है कई सारी एक ऐसी भी कहावत है कि History was once a conspiracy theory ऐसा भी होता है क्या सही है क्या गलत हो तो हमें नहीं पता चलता है लेकिन हम फिर भी प्रयास करेंगे जानने का कि सही क्या है और गलत क्या है अब इस बात में कोई संधेय नहीं है कि भारत बटे, भारत के टुकडे हो, भारत दुरबल हो ऐसा चाहने वाले लोगों की संख्या बहुत है भारत के अंदर भी और भारत के बाहर भी ऐसे लोगों की संख्या में ना तो कमी आई है ना कमी आईगी, ऐसे लोग बढ़ेंगे बढ़ेंगे फॉर्ट लाइन जिसको कहे देते हैं फॉर्ट लाइन यानि अर्थक्विक के आशे में कि यहां यहां से कम्जोरी है यहां यहां से हम इन लोगों को तोड़ सकते हैं उसका प्रयोग करके समाज को बांटने का प्रयास किया जाता है अभी चुनाव में चुनाव चल रहा है उपी में चुनाव नहीं भी चल रहा था तब भी इस प्रकार का प्रयोग करने का कई बार प्रयास करते हैं कि यह जो सवंध लोग हैं उची जाती और नीची जाती दो प्रकार से बांट दिया अब यह भी वैसे बड़ा रोचक है कि उची और नीची जाती का क्या चक्र है हर्बट होब रिजली नाम से एक अंग्रेजी सेंसस कार रहे काफी युवा वास्था में उन्होंने सेंसस का काम अपने हाथ में लिया तो अब कॉंटरडिक्शन हमारे सामने यह है प्रॉबलम हमारे सामने यह है कि चाहें वो सेंसस की बात हो चाहें वो ये सर्वे वगारा की बात हो चाहें वो संस्कृत के पुराने शास्त्र और ग्रंथ चापने की बात हो इन सब के लिए हमें जख मार के कुछ भी करके अंग्रेजों को क्रेडिट देना पड़ता है क्योंकि हमारा तो सामर्थे नहीं था उस समय हम पूरा हिंदु समाज ही उस समय दलिद था रिजली ने सोचा के वर्गी करन हमें करना चीज़ है समाज का भारत में नई चीज है लेकिन नई चीज नहीं थी कास्ट जो शब्द है जो अंग्रेजी में प्रयोग किया जाता है वो स्पेन में पहले प्रयोग किया जाता था क्लास दिवाइट बोल दीजे या जो भी बोल दीजे वहाँ पर रंग के आधार पर होता था कि ये आदमी गोरा है ये आदमी काला है या ये कम गोरा है उससे साफ से लोगों का वर्गी करन था कि जितना गोरा होगा उतना बढ़िया होगा तो कास सब तो वहाँ से था उसको लाकर कि उस कंस्ट्रक्ट को भारत पर अपलाई करने का प्रयास किया गया अगडी और पिछड़ी जातियों बनाने का प्रयास किया गया इन्होंने रिजली महोदे ने इस प्रकार से अपनी पुस्तक में लिखा है कई बार मैं लोगों के पास जाता हूँ और वो लोग मेरी लिस्ट को रिजट कर देते हैं कि हम तो ये जाती नहीं है, हम ये जाती है या हम अगडी नहीं है, हम पिछड़े है वगरा वगरा, बहुत कौन्फ्लिक्त हैं, मुझे सामने से जाके उनको बताना पड़ता है अपने आपको उन्होंने रेस साइन्टिस्ट बताने का प्रयास किया जब डार्विन की थियोरी अपने एचरम पर थी तो ये प्रचार करने का प्रयास किया कि जिस प्रकार से पश्मों से मनुष्य बने या जो भी उनका सिध्धान था उस प्रकार से ही मनुष्यों में भी कुछ लोग जादा विक्सित हैं और कुछ लोग कम विक्सित हैं जो जितना काला है उतना कम विक्सित है हम लोग तो बीच में आते हैं तो इस प्रकार का उन्होंने प्रचार करने का प्रयास किया अब यहां तक भी उन्होने दिमाग लगाया कि नाक की कितनी लंबाई है उसका बाकी चेहरे से क्या रेशियो है उसके सापसे हम जातियों का वर्गी करण करें मतलब इतने प्रकार के मुख्था पुंड प्रयास किये गए अगर हम पुराने समाज को देखें तो आधान करने का प्रसंग जो आता है स्रवत सूतर में ही यानि कि कौन आदमी अगने होतर करने का अधिकारी है हम कई बारी ये बात सोचते हैं कि ऐसा कभी था ही नहीं ये ऐसा कभी हो नहीं सकता कि दो जातियों में परसपर अलग अलग जातियों में जा दो वर्णों में विवाः सम्बंद हो परन्तु ऐसा नहीं है पहले इसकी अनुमती थी ये बात सच है कि ये प्रसंग से नहीं था प्रसंग से इसलिए नहीं था कि दो समान अभिरूची वाले लोगों में बहतर सामन जैसे बैठता है और वो बहतर परिवार का पालन पोशन कर सकते हैं मनुष्य के जीवन का उद्देश्य प्रमुख उद्देश्यों में से परिवार बनाना आगे संसार को बढ़ाना ये प्रमुख उद्देश्यों में से माना गया है आचार्य आया प्रजातन्तुम आचार्य आया प्रियम धर्म आखरित्य प्रजातन्तुम आव्यवच्छेत्सी ही इस परकार से 33 उपनिशत में है यानि के ऐसा नहीं है जैसा आजकल लोग समझते हैं के पुराने तब और कैसे होना चाहिए? देखिये वर्ण का निर्धारन देखिये वर्ण का निर्धारन मूल में जहां बात आती है तो व्यक्ती के मूल में जहां बात आती है तो व्यक्ती के खुद के उपर आती है लेकिन कोई छोटा बालक है नहीं जानता वो क्या करेगा, क्या नहीं करेगा वगर देखिये जैसे आज कल के भी स्कूल में एक हमने एज लिमिट तैकी हुए है कि सोला साल के बाद लड़का तैकरेगा क्यों कॉमर्स में जाएगा, साइंस में जाएगा, आर्ट्स में जाएगा ऐसे ही ऐसा मेरा अनुमान है ऐसा मुझे पढ़ने को तो नहीं मिला कहीं पर मेरा ऐसा अनुमान है कि पहले भी कुछ ना कुछ ऐसा घटक रहा होगा कि ये बेसिक एजुकेशन है यहां तक तो सबको पढ़ा होगा ही जैसे विवा होता है विवा होता है तो विवा में मन्तर बोलने होते हैं विवा के मन्तर तो कुछ-कुछ मन्तर बहुत जादा रुमैंटिक टाइप हैं लेकिन वो पंडिज जी बोलते हैं ऐसा भी मन्तर है जिसका अगर एकदम मतलब निकालें और थोड़ी सी भाषा फिल्मी कर दे तो अब इसके बाद में अब तुम एड्मिनिस्टेशन सीखो या वियाकरन सीखो या कुछ और सीखो एक समय के बाद में वो अंतर आएगा अब वो विवस्ता पहले क्या थी ये नहीं पता चलता अभी मुझे कहीं देखने को नहीं मिला कि कैसे हम जाने कि पहले लोग कब डिसाइट करते थे ये समझ में आता है कि पहले परिवर्तन हो जाता था ये भी समझ में आता है कि पहले व्यक्ति के ऊपर ऐसा दबाव नहीं था कि या तो मर जाओ या तो यही रहो ऐसा भी नहीं था ये दो बाते तो समझ में आती हैं आजकल के साथ से आप बात करते हैं तो आजकल के लिए सबसे बड़ी जो कठिनाई है जो अभी आप थोड़ दिर पहले भी कह रहे थे बाहर पाठ्ठे क्रम की बात है या क्या पढ़ाना है उसकी बात है उसको सहेजना उसको समालना जो ये महोदे भी कह रहे थे अभी कि बच्चे को बच्चवन में ही वेद मंतर पढ़ाना पढ़ता है तो हम कैसे पता करेंगे कि वो कौन से वर्ण का है वगरा ये सारी सिट्वेशन मतलब अभी हमें किसी तरह से रिकावर कर जाना है बस एक बार एक जीरो के लिवल पर अभी हम जीरो पर भी नहीं हैं अभी हम माइनस में हैं और जो हमारे सवाल है जो आपका सवाल है वो तब का है जो हम कम से कम जीरो पर तो हो अभी कम से कम इतना तो हो कि वेद मंतर बोलने वाले सौपचास हजार धंके लोग तो हो जिनको इस बात की चिंता तो ना करनी पढ़े कि मैं रोटी कैसे लाओंगा आज की ऐसे लोग तो हों कम से कम उसके बाद इन सवालों का जवाब ढूंडना कहीं सरल हो जायेगा पाठीकरम हम फिर से कुछ बनाना पढ़ेगा जो मैं कह रहा था अभी वेद मंतर पढ़ने से पहले धातु पाठ से होती थी क्योंकि वेद मंतर पहले ओबियस होते थे आ जाते थे समझ में पढ़ने के लिए इतना कश्ट नहीं करना पढ़ता था बस कंठस करने के लिए कश्ट हमेशा रहता है तो जब हम उस थिति पर आ जाएं तब हम इस पर विचार कर सकते हैं कि अब हम फिर से पुरानी विवस्था को कैसे लागू करें आप कुछ कह रहे थे काफी सारे शब्द होते हैं आपने उसका लेख भी किया तो ऐसे एक गोत्र शब्द भी आता है जिसको मैं समझने के लिए प्रयास करना था गोत्र, कुल, जाती, वर्ण ये थीन चार शब्द हैं इनका संबंध आप थोड़ा सा गोत्र से आपने बहुत बढ़िया बात निकली मैंने सोचा भी था बोलूंगा पर मैं तैयारी नहीं कर पाया तो मुझे याद नहीं रहा खेर, गोत्र जो है, गोत्र ही केवल नहीं किसी भी व्यक्ति के चार परिचे होते हैं हिंदु समाज में, जो आज के समय में केवल गोत्र बचा है, बाखी तीन बचे नहीं है बचे नहीं आनें कि जो पता है उसको पता है जनरली स्पीकिंग नहीं बचे है गोत्र भी आजकर लोगों को जब शादी होती तभी पता चलता है वरना गोत्र भी किसी को ध्यान नहीं रहता है तो गोत्र, प्रवर, शाखा और सूत्र यह चार परिचा हर व्यक्ति के होते हैं गोत्र मानें आप किस रिशी के संतान हो अब जो मैं कहा रहा था एवॉल्व होने वाली बात तो वो आपको यहाँ पर और समझ में आगे मतलब यह हिंदू संप्रदाय की विशेष्टा है कि आप जहां भी देखोगे हर बार आपको ऐसा लगेगे कि हर बार बात बदल जाते हैं और हर बार बहतर बात पर आ जाते हैं पहले से पिछले हजार साल का इतिहास ऐसा नहीं है वो बात सच है लेकिन जब तक हम बड़िया थे तब हमारी यह विशेष्टा थी तो गोत्र है उसके बाद प्रवर है उसके बाद शाखा है उसके बाद सूत्र है गोत्र याने हम किसकी संतान है प्रवर याने हम जिसकी संतान है उसके कुल में या उसके खांदान में उसके लिनियेज में और कितने महान लोग हुए हैं एक, तीन, पान्च, साथ ऐसे गिंतिया होती है शाखा याने कि वेद की कौन शाखा हमारे घर में चलती है हम किसको पढ़ते हैं, किसके सापसे कर्मकांट करते हैं और सूत्र याने उसी शाखा के जो सूत्र रचे गए हैं उसी शाखा के जो सूत्र रचे गए हैं उनको हम सूत्र कह देते हैं ये केवल प्राहमनों में नहीं होते हैं, सब में होते हैं अब बड़ी ही रोचक बात इसमें ध्यान में देने में अब गोतर से फिर प्रवर पर आते हैं जैसे मेरा भारतद्वाज गोतर है मेरे प्रवर है आंगिरस, भारसपत्य और भारतद्वाज आंगिरस, उनके पुत्र भारसपत्य, उनके ब्रहसपति, उनके पुत्र भारतद्वाज ये तीन मेरे प्रवर हैं अब जो कुल, जाती, व्यक्ति हुआ, व्यक्ति की निजी पहचान हुई, गोतर वा गरा, ये सामोहिक पहचान भी है, उसके कुल तक सीमित है, कुल क्या, परिवार तक ही सीमित है, कुल में तो मा का कुल भी आ जाता है, जिसका गोतर सपष्टता अलग ही होता है व्यक्ति के उपर परिवार हुआ, परिवार के उपर कुल हुआ, कुल के उपर जाती हुई, और जाती के उपर वन हुआ ऐसा तो मैं नहीं कहुंगा क्योंकि वन सूख्ष्म है, सभी को भेधता है, वन एक ही जाती में अनेक वन भी हो सकते हैं, और एक वन में अनेको जाती में भी हो सकती हैं, होती हैं, तो गोत्र का समबन्द एकड़म मौलिक परिचे से है, उसी प्रकार से कुल, जाती, और वन उसके बाद में आता है इस में एक गोत्र और एक गोत्री, अद्वाल्यू, इस में दिरेक्ट मैपिंग नहीं है? नहीं, इसमें कोई मैपिंग नहीं है, पिता जो शब्द है वो भी पित्री से बनता है, मात्री, दुहित्री, तो पीछे रिवी लगने से कोई मैपिंग नहीं बनती है, तो गोत्र जो शब्द है, वैसे उसमें भी लगता भी नहीं है, उसमें त्रा है पूत्री और रिगवेद हाँ, उनका सम्मन्ध है, उसी बात पर आ रहा हूं, उसी बात पर आ रहा हूं, उसी बात पर आ रहा हूं नहीं, मैपिंग है, ऐसा नहीं है कि वो शब्द है, शब्द है और उसका कुछ तातपर्य विशेश है जो एल्टर अफायर वीडियो की बात चल रही थे, दर्शिष्टी वेगरा की, चारों जो वेद हैं देखिए, हर वेद के special काम होते हैं, रिगवेद को हम घ्यान कांड से जोडते हैं, कि इसमें basic definition टाइप की बाते हैं, ऐसा ऐसा होता है, ऐसा ऐसा है, करना क्या है, उसके बारे में बहुत अधिक नहीं है, लेकिन बहुत basic बाते हैं, इसलिए वो सबसे बड़ा भी है कोई बी आप शास्त्रे गरंथ उठाएंगे, उसका परिभाषा परकरन सबसे बड़ा होगा, यानि कि जहांपर define किये जाता है, हर शास्त्र में चीज का अलग मतलब होता है, धर्म शब्द है, धर्म शब्द का अगर आप नियाय में पढ़ेंगे तो अलग मतलब निकलेग वैसे भी अगर आप हिंदी में भी देखें, तो हम कहते हैं हमारे हिंदू धर्म है, फिर हम ये भी कहते हैं कि भाई का तो धर्म ऐसा है, शब्द की आर्थ प्रसंग की अनुसार बदलते हैं, इसलिए उनको properly define करना बहुत ज़रूरी है, वियाकरण में वृद्धी कहते हैं अलग चीज को, और सामाने भाषा में वृद्धी कहते हैं हम तरक्की को, तो शब्दों को define करना बहुत ज़रूरी है, रिगवेद में definition है ऐसा कह सकते हैं, यजुरवेद में कर्मकांड और भोतिक विध्याएं, इन पर विशेश बल है, सामवेद में संगीत और भक्ति प्रकार के बातें, आत्मिक बातें, spirituality जिसका हम कह सकते हैं, वो बातें अधिक हैं और अथरवेद ज़्यादा करके miscellaneous कहलीजिये, engineering कहलीजिये, वगरह वगरह उस तरह से जोड सकते हैं क्योंकि अथरवेद का उपवेद, engineering या शिल्पवेद वगरह ये सब चीज़ें हैं, जो की शूद्रों का डॉमेन था इस वज़े से अथरवेद की भध पिटी है पिछले दो तीन सो सालों में पर ऐसा नहीं है, पहले से ही चार वेद थे, अंग्रेजों ने यहां तक प्रचार किया कि पहले तीन ही वेद थे, फिर शूद्रों ने अपना एक अलग वेद बना लिया वगर ऐसा कुछ भी नहीं है, यह सब बाते निराधार है यहां तक कि ऐसा भी है कि ऐसे भी लोग मिलें मुझे जो तमिल में पहले वेद थे, बाद में ब्रह्मानों ने कॉंस्पिरेशी करके संस्कृत में अनुबाद कर दिया यह सा बोलते है अब इसमें कॉंफलिक देखिये आप, वो आदमी वेद को मानना चाहरा है, लेकिन वो संस्कृत को और ब्रह्मानों को नहीं मानना चाहरा अब होता यह रिगवेद का प्रमुख होता है, अधवर्यू यजरवेद का प्रमुख होता है, उद्गीता सामवेद का प्रमुख होता है अधवर्यू यजरवेद का प्रमुख होता है, अधवर्यू यजरवेद का प्रमुख होता है, अधवर्यू यजरवेद का प्रमुख होता है, अधवर्यू यजरवेद का प्रमुख होता है, अधवर्यू यजरवेद का प्रमुख होता है, अधवर्यू यजरवेद का प् यजरवेद का, अधवर्यू यजरवेद का, अधवर्यू यजरवेद का.