पूजा-पाठ क्या है और उसे क्यों किया जाता है ? – दत्तराज देशपांडे का व्याख्यान

आज की समय में पूजा-पाठ एक बहुत ही गलत समझा जाने वाला शब्द है। हम नियमित रूप से मंदिर जाते हैं और घरों में भी पूजा करते हैं। अगर कोई बच्चा हमारे पास आकर, हमसे पूछता है, कि हम क्या कर रहे हैं, तो हमारे पास इसका कोई उचित जवाब नहीं है। केवल पूजा ही नहीं, हम सभी प्रकार के अनुष्ठानों को इसी में जोड़ देते हैं और उन सभी को पूजा-पाठ कह देते हैं। हमें लगता है कि शादी की प्रक्रिया भी किसी पंडित द्वारा निभाई जाने वाली पूजा ही है। वास्तविकता में, विवाह प्रक्रिया न तो पूजा है न पाठ। हम तो यह तक नहीं जानते हैं कि पूजा और पाठ दो भिन्न चीजें हैं।

कई योगा विशेषज्ञ / ध्यानी स्वयं को आध्यात्मिक व्यक्ति मानते हैं। इसलिए, अनुष्ठान या पूजा-पाठ उनके दृष्टिकोण में व्यर्थ एवं हीन गतिविधि हैं। कुछ अन्य लोग हैं, जो अनेक आध्यात्मिक पुस्तकें भी पढ़ते हैं और आत्मज्ञान इत्यादि के बारे में बातें करते हैं, लेकिन इसके साथ ही, वे अनुष्ठानों को अज्ञानी व्यक्तियों की गतिविधि या सांस्कृतिक समरूपता से संबंधित मानते हैं। जो लोग खुद को धर्म से ऊपर मानते हैं, वे अनुष्ठानों को धार्मिक गतिविधि मानते हैं। अतः पूजा या अनुष्ठान के बारे में कई धारणाएं, विचार और मिथ्याबोध हैं। यह वार्ता हिंदू अनुष्ठानों और उनके उद्देश्य का मूल परिचय प्रदान करने का एक प्रयास है।


वक्ता-परिचय: –

दत्तराज देशपांडे, बैंगलोर से ऋग्वेद के घनापथी और दशग्रंथी हैं। उनकी पूरी शिक्षा मौखिक परंपरा या गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से हुई है। वे कर्नाटक संस्कृत विश्वविद्यालय से स्वर्ण पदक विजेता हैं। वर्तमान में वह भारतीय शिक्षण मंडल में पूर्णकालिक स्वयंसेवक हैं और गुरुकुल शिक्षा प्रणाली के पुनरुद्धार की दिशा में कार्यरत हैं। आगे…


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