यद्यपि संस्कृतनिष्ठ और प्राकृतनिष्ठ हिन्दी बोलने और लिखने वाले अनेक लोग हैं, तथापि आजकल की लोकप्रिय हिन्दी उर्दू-हिन्दी की खिचड़ी है। नव-स्वतन्त्र भारत में “बाज़ार की भाषा” के नाम पर मिश्रित उर्दू-हिन्दी का समर्थन हुआ, और बॉलीवुड द्वारा अरबी-फ़ारसी शब्दों के प्राचुर्य वाली उर्दू का ही प्रचार-प्रसार होता आया है। क्या आज भी विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अनुकूल एक सभ्य आर्य भाषा के रूप में संस्कृतनिष्ठ और प्राकृतनिष्ठ हिन्दी में बोलचाल और लेखन संभव है?
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